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बिहार में निवेश रुका: उद्यमियों का करोड़ों का पैसा पॉलिसी विवाद में फंसा

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बिहार में पुरानी (2016) और नई (2025) औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीतियों के बीच विवाद के कारण कई उद्यमियों का करोड़ों का निवेश अटका हुआ है। उद्योग विभाग और राज्य कैबिनेट समाधान पर विचार कर रहे हैं।

पटना/आलम की खबर:बिहार में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई पुरानी और नई नीतियों के बीच विवाद ने कई उद्यमियों की योजनाओं को ठप कर दिया है। राज्य में दो दर्जन से अधिक ऐसे उद्यमी हैं, जिन्होंने 2016 की औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन पॉलिसी के तहत स्टेज-1 क्लियरेंस प्राप्त किया था, लेकिन अब वे 2025 की नई पॉलिसी का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इस स्थिति के कारण करोड़ों रुपए के निवेश फिलहाल अटका हुआ है, जिससे उद्योग विभाग और राज्य सरकार दोनों पर दबाव बढ़ गया है।

पुरानी पॉलिसी के तहत स्टेज-1 क्लियरेंस पाने का मतलब था कि उद्यमी को औद्योगिक इकाई स्थापित करने की अनुमति मिल गई। इस प्रक्रिया में जिन्होंने तत्काल उद्योग स्थापित किया, उन्हें नियम के अनुसार निर्धारित सब्सिडी मिल गई। वहीं, जिन उद्यमियों ने तुरंत उद्योग नहीं लगाया, उन्हें कोई लाभ नहीं मिला। अब 2025 की नई औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन पॉलिसी लागू होने के बाद, 2016 में क्लियरेंस लेने वाले उद्यमी इस नई नीति के तहत निवेश प्रक्रिया शुरू करना चाहते हैं, लेकिन विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि पुराने क्लियरेंस को नई नीति के साथ मिलाना संभव नहीं है।

उद्यमियों का कहना है कि उन्होंने 2016 की नीति के तहत किसी भी तरह का लाभ नहीं लिया और यदि वे नई नीति के तहत निवेश करना चाहते हैं, तो इसमें गलत क्या है। बड़ी संख्या में ऐसे उद्यमी हैं, जो 2025 की नई पॉलिसी के तहत करोड़ों रुपए का निवेश करने की योजना बना रहे हैं, लेकिन पॉलिसी विवाद के कारण उनकी योजना रुकी हुई है।

हालांकि, नई पॉलिसी के तहत सब्सिडी प्राप्त करने की अंतिम तिथि को 31 मार्च से बढ़ाकर तीन महीने करने का फैसला राज्य सरकार ने लिया है, जिससे उद्यमियों को कुछ राहत मिली है। लेकिन यह अस्थायी उपाय ही है; पूरी तरह समाधान के लिए राज्य कैबिनेट के स्तर पर निर्णय आवश्यक माना जा रहा है।

बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (BIA) ने उद्योग विभाग और सरकार से आग्रह किया है कि वे उद्यमियों के अटके निवेश को जल्द से जल्द मंजूरी दिलाएं, ताकि निवेश प्रक्रिया में बाधा न आए और बिहार में औद्योगिक विकास को गति मिल सके। विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस विवाद का समाधान शीघ्र नहीं हुआ, तो यह न केवल उद्यमियों के लिए बल्कि राज्य की औद्योगिक छवि के लिए भी गंभीर चुनौती बन सकता है।

राज्य सरकार के पास अब यह चुनौती है कि कैसे पुरानी और नई नीतियों के बीच फंसे उद्यमियों के हितों को संतुलित किया जाए और साथ ही बिहार में निवेश को बढ़ावा देने की दिशा में स्पष्ट संकेत दिया जाए। उद्योग जगत के लिए यह मामला लंबे समय तक चर्चा में रहेगा और भविष्य के निवेश निर्णयों पर इसका असर पड़ सकता है।

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